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आचार्य दण्डी और काव्यादर्श

आचार्य दण्डी और काव्यादर्श

आचार्य दण्डी और काव्यादर्श

आचार्य दण्डी और काव्यादर्श

डा. राकेश कुमार जैन

संस्कृत साहित्यशास्त्र के इतिहास में आचार्य दण्डी का विशेष महत्त्व है । इनका ‘काव्यादर्श’ ग्रन्थ शताब्दियों से साहित्यशास्त्र के आचार्यों के लिए आदर का पात्र बना हुआ है । दण्डी ने न केवल आलङ्कारिक के रूप में बल्कि कवि के रूप में भी अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त की है । कहा जाता है – जाते जगति वाल्मीकौ कविरित्यभिधाऽभवत् । कवी इति ततो व्यासे कवयस्त्वयि दण्डिनि ।। अर्थात् पहले तो केवल एक ही कवि वाल्मीकि थे, व्यास के होने पर दो कवि हो गये तथा दण्डी के होने पर इनकी संख्या तीन हो गयी । संस्कृत साहित्य में यदि कालिदास को उपमा के लिए,भारवि को अर्थ के गौरव के लिए, तो दण्डी को अपने पदलालित्य के प्रसिद्ध माना जाता है । पूर्वापर आचार्यों के आधार पर आचार्य दण्डी का समय ईस्वीय सातवीं शताब्दी का उत्तरार्ध तथा ई. आठवीं शताब्दी का पूर्वार्ध निश्चित किया जाता है ।

आचार्य दण्डी का जीवन परिचय – ‘अवन्तिसुन्दरकथा’ नामक गद्य काव्य के अनुसार महाकवि दण्डी के माता-पिता का नाम वीररथ और गौरी था । इनके पूर्वज भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेश के आनन्दपुर नामक स्थान से नासिक के अचलपुर नामक स्थान पर आकर बस गये थे । इनके प्रपितामह दामोदर काञ्ची के पल्लववंशी राजा सिंहविष्णु के आश्रय रहें ।  इनके बाल्यावस्था में ही माता-पिता की मृत्यु हो गयी थी । काञ्ची में महान् विप्लव होने के कारण इस नगरी को छोडकर दण्डी वर्षों तक अनेक स्थानों पर भ्रमण करके विद्याध्ययन करते रहे । अन्त में युवा होने पर वे काञ्ची में वापस आये । यहाँ सरस्वती के आदेश से इन्होनें अपने मित्रों को विद्याधर नरेश राजवाहन की कथा सुनाई, जो कि अवन्तिसुन्दरीकथा के नाम से प्रसिद्ध है । दण्डी का नाम दण्डी क्यों हुआ, इस सम्बन्ध में एक किम्वदन्ती प्रसिद्ध है कि दशकुमारचरितम् के ‘ब्रह्माण्डच्छत्रदण्डः शतधृतिभवनाम्भोरुहो नालदण्डःमें दण्ड शब्द के प्रयोग के कारण लोगों ने इनको दण्डी कहना प्रारम्भ कर दिया ।

आचार्य दण्डी की रचनाएं –  आचार्य दण्डी की तीन रचनाएं हैं – काव्यादर्श, दशकुमारचरित और अवन्तिसुन्दरीकथा । दशकुमारचरिंत और अवन्तिसुन्दरीकथा लक्ष्यग्रन्थ है और काव्यादर्श लक्षण ग्रन्थ है । प्रसंगानुकूल यहाँ काव्यादर्श का परिचय दिया जा रहा है –

काव्यादर्श परिचय –  काव्यादर्श में  3 परिच्छेद एवं 660 श्लोक हैं । परिच्छेद के क्रम से इसकी विषय वस्तु निम्न प्रकार से है ,  प्रथम परिच्छेद –  मंगलाचरण के बाद काव्य की परिभाषा करके उसके तीन भेद – गद्य, पद्य और मिश्र बताये हैं । इसके बाद सर्गबन्ध काव्य का स्वरूप बताया है । कथा और आख्यायिका के भेद का निरूपण करते हुए दण्डी ने कहा कि वस्तुतः इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है । साहित्य के भाषागत भेद – संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और मिश्र भेद बताये हैं । वैदर्भ और गौड मार्गों का वर्णन करके दस गुणों का वर्णन है । अनुप्रास के लक्षण तथा उदाहरण दिये हैं । अन्त में कवित्व के तीन साधनों – प्रतिभा, पठन और अभ्यास की चर्चा है । द्वितीय परिच्छेद – दूसरे परिच्छेद में अलङ्कार शब्द की परिभाषा करके 35 अलङ्कारों की गणना भी गयी है । इसके बाद उन अलंकारों के लक्षण और उदाहरण दिये गये हैं । तृतीय परिच्छेद –  इसमें पहले 77 श्लोकों में यमक अलङ्कार का विस्तृत वर्णन है । पश्चात् 18 श्लोकों में गोमूत्रिका, अर्धभ्रम, सर्वतोभद्र, स्वस्थानवर्णनियम आदि चित्रबन्ध अलङ्कारों के लक्षण और उदाहरण हैं । तदनन्तर 29 श्लोकों में प्रहेलिकाओं का विवेचन है । अन्त में 63 श्लोकों में दस प्रकार के दोषों का वर्णन है ।

काव्यादर्श की शैली अधिक सरल तथा सारगर्भित है । कवित्व की दृष्टि से भी दण्डी का स्थान बहुत ऊँचा है । उन्होंने काव्यादर्श में जो उदाहरण दिये हैं , उनमें अधिकांश स्वरचित हैं ।    आचार्य दण्डी ने काव्यादर्श में गुणों और अलङ्कारों का विशद वर्णन किया है । अतः इनको अलङ्कारवादी आचार्य कहा जाता है । इन्होंने रीतियों की भी विवेचना की है  परन्तु उसके लिये रीति शब्द का नहीं , अपितु वर्त्म या मार्ग शब्द का प्रयोग किया है – वैदर्भ और गौड । आचार्य दण्डी का कथन है कि सूक्ष्म भेद वाली वाणी की शैलियों के अनेक भेद होते हैं । इनमें उन्होंने वैदर्भ और गौड मार्गों का वर्णन किया है । क्योंकि इनमें अधिक भेद दिखाई देता है।  अलङ्कारवादी होते हुए भी दण्डी रस के माधुर्य से परिचित थे और काव्य में रस की स्थिति को अनिवार्य मानते थे । काव्यादर्श के उदाहरणों मे कुछ ऐसे भी तथ्य आये हैं , जो ऐतिहासिक एवं भौगोलिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं , जैसे – मलय , काञ्ची , अवन्ती , राजवर्मन् , महाभाष्य , भरत नाट्यशास्त्र आदि ।

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