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धर्म एवं ईश्वर का स्वरूप

धर्म एवं ईश्वर का स्वरूप

धर्म एवं ईश्वर का स्वरूप

धर्म एवं ईश्वर का वास्तविक स्वरूप        पण्डित परन्तप प्रेमशंकर सिद्धपुर

 

विश्वमें अनेक संस्कृतियां एवं सभ्यताए प्रवर्तमान है । मानवी अपनी संस्कृति या सभ्यता को ही सर्वश्रेष्ठ स्थापित करनेका प्रयास करता रहता है, और वह सर्वस्विकार्य नहीं होता । परिणामतः वर्गविग्रह, जातिविग्रह, देशविग्रहादि का प्रकोप बढता है ।

 

हमारी मान्यताए एवं विचारधारा पर हमारे पारिवारिक, सामाजिक मान्यताओं का ज्यादा ही प्रभाव होता है, यथा हम तटस्थ विचार नहीं करते । हम हमारी अपनी स्थिति एवं दृष्टि से ही सबकुछ सिद्ध करनेका दूराग्रह रखते है और यहां से विवाद का प्रारम्भ होता है ।

 

मान लो कि हमारा जन्म मुस्लिम परिवार में हुआ होता या हमारा विकास वहां हुआ होता तो, हमारे मानस पर इस्लाम विचार धारा प्रभावी होती, हमारे लिए कुरान से सर्वश्रेष्ठ कोई ग्रंथ नहीं होता, अल्लाताला को ही ब्रह्माण्ड मालिक हम स्वीकार करते । यदि ईसाई परिवारमें जन्मे होते तो ईसा मसीहा एवं बाईबल ही सब कुछ होता, हिन्दु है, तो वेद-पुराण ही हमारे लिए श्रेष्ठ होता ।

 

ये मान्यताए यहां तक सिमित नहीं है, प्रत्येक धर्ममें भी अनेक पंथ व सम्प्रदाय है । सिया-सून्नी, प्रोटेस्टन्ट-कैथेलिक, श्विताम्बर जैन-दिगम्बर जैन, अकाली शिख-निरंकारी शिख, बाप्स स्वामीनारायण-वडताल स्वामीनारायण, योगेश्वर, अक्रम, गायत्री परिवार, आर्य समाज, वैष्णव, शैव, शाक्त इत्यादि । एक और दुर्भाग्य यह है कि, ये सब स्वयंके अधिष्ठाता को ही सर्वश्रेष्ठ करनेकी स्पर्धा में लगे है । अपने सम्पदाय के हिसाब से ही अपने इष्ट को सर्वश्रेष्ठ, सर्वमान्य, सर्वोपरि सिद्ध करनेकी चेष्टा इतनी खतरनाक होती है कि, इस से ही युद्ध – विग्रह –  विच्छेद बढते है । वास्तव में इसे कट्टरवाद कहे तो बूरा नहीं है । इसमें ही वैश्विक अशान्ति के विषैले बीज होते है । इनके अनुयायी परस्पर विवाद ही करते हैं । क्या धर्म का यह स्वरूप ठीक है,  धर्म में विवाद नहीं संवाद होता है ।

 

आज एक युक्तियुक्त विचारकी आवश्यकता है कि, वास्तव में धर्म क्यां है ? सर्वोपरि परमात्मा या ब्रह्माण्डका सर्जनहार कौन है ? यदि हम राम-कृष्णको मानेंगे तो वह इस्लाम, ईसाइ को स्वीकार्य नहीं होगा, हम अल्लाताला को  माने तो वह, हिन्दु व ईसाइयों को स्वीकार्य नहीं होगा, हम जिसस कहे तो हिन्दु व इस्लाम को स्वीकार्य नहीं होगा ।

 

मानलो, आज हम वैष्णव या शैव है, किन्तु यदि हमारा जन्म मुस्लिम या ख्रिस्ती परिवारमें होता तो, यह हम विष्णुका स्वीकार करते क्या ? यदि कोई मुस्लिम का जन्म या परवरिश हिन्दु परिवार में होता तो अल्ला उसे स्वीकृत होता ?

 

तो धर्म का वास्तिविक स्वरूप क्या है ? परमात्मा कैसा है ? कहां हैं  ? यतोऽभ्युदय निःश्रेयससिद्धिः स धर्मः  अर्थात् जिससे जीवमात्र का कल्याण हो वही धर्म । धारणात् धर्म इत्याहुः धर्मों धारयति प्रजाः । यः स्यात् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः।।

अर्थात् – जो धारण करता है, एकत्र करता है, अलगाव को दूर करता है, उसे धर्म कहते हैं। ऐसा धर्म प्रजा को धारण करता है। जिसमें प्रजा को एकसूत्रता में बांध देने की ताकत है, वह निश्चय ही धर्म है ।

 

ऐसे धर्म का उद्गम  स्वयं के अन्तरात्मा से है, यदि हमारी आत्मा Conscious जो करने की ना कहे वह अधर्म है । यदि कोई जीवकी हिंसा या वध करते समय हमें दुःख या ग्लानी की संवेदना होती है तो अहिंसा धर्म है । जो हमे परपीडन से प्राप्त होता है, इसमें परमात्मा कदापि खुश नहीं हो सकता, क्योंकि जिसे हम पीडा दे रहे है वह भी परमात्मा का ही सर्जन है । वसुधैव कुटुम्बकम् के नाते समग्र जलचर, स्थलचर, खेचर मिलकर एक वैश्विक परिवार बनता  है, हमारे पिता हमारे भाई को पीडा दे तो कदापि खुश नहीं होंगे । वास्तव में असमझदारी में हम स्वयं के सिद्धान्त को सिद्ध करनेकी स्पर्धा में जो युद्ध या विग्रह करते है वह अधर्म है, फिर चाहे वह हिन्दु हो, इस्लाम हो या ईसाइ ।

 

कोई मानव भारत में हो या अमरिका में, चीन में या श्रीलंकामें, आफ्रिका में हो या ओस्ट्रेलिया में, सब को दो आंखे, दो हाथ इत्यादि समान अंग होते है, सबका पचनतंत्र, श्वसनतंत्र, उत्सर्जनतंत्र, रूधिराभसरण  एवं  यकृत एक जैसे ही काम करता है । पक्षी – वृक्ष का सामान्य स्वरूप एक जैसा ही है । कौए  क्राउ-क्राउ करते है व काले होते  है, गाय दूध देती  है, वृक्षों  के पांव नही होते, भेंस भारत में होया आफ्रिका में दो शिंग ही होते  है । जीव मात्र में एक जैसी क्षुधा-तृषा-काम-भय-निद्रा की ऊर्मियां होती है, जो धर्म – संप्रदाय – जाति   निरपेक्ष  होती  है । सूर्य – चन्द्र – वर्षा – ऋतुए भी कभी नाम, देश, जाति पूछकर अपनी शक्ति प्रभावित नहीं करते । यथा इस समस्त ब्रह्माण्ड का सर्जनहार एक ही है, हम किसीका नाम नहीं देते ।

अब यह सर्जनहार कौन है ? जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट् । तेने ब्रह्म हृदा य आदिकवये मुह्यन्ति यत्सूरयः ।। तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोमृशाः । धाम्नास्वेन सदा निरस्तकुहकंसत्यं परं धीमहि ।। सारांश हमारे जन्म से पूर्व से जो है (अनादि), जिसकी शक्ति से समग्र ब्रह्माण्ड की उत्त्पत्ति, स्थित-पोषण, एवं संहार होता है – सर्वशक्तिमान्, जो किसी नवजात शीषु के, जन्म से पूर्व ही उनके योगक्षेम का विचार करके, उसकी माता के स्तनमें पयामृत भरता है – पक्षीयों को घोसला बनाना – आकाश विचरण करना सीखाता है, वह शक्ति । पशु-पक्षी-जलचर-स्थलचर सभी में आहार,  विहार, मैथुन, भयादि का संचार करनेवाली महा शक्ति, जो तीनो काल में अबाधित है और विद्वान भी जिसे पूरा नहीं समझ सके, उस परम सत्य का हम ध्यान करते है । अपनी स्वयं प्रकाश ज्योति से सर्वदा और सर्वथा माया और मायाकार्य से पूर्णतः मुक्त रहनेवाले सत्यरूप परमात्मा का हम ध्यान करते है । ऐसा भी नहीं है कि भारत के लोगो का कल्याण हो, या सत्युग में जन्मे लोगो का कल्याण हो, केवल हिन्दुओं का, केवल पुरूषों का कल्याण ऐसा भी नहीं । पूरे ब्रह्माण्ड की बात है ।

विश्व में जो कुछ भी दिखता है वह परमपिता का सर्जन है, एक ही मालिक है, चाहे उसे कोई भी नाम दो । एक ही व्यक्ति को सम्बन्ध परिर्तन से पिता कहते है, वह कही साहब है कहीं नोकर है, कहीं पति है, कहीं पुत्र है, कहीं भाई है, कई जगह पर वह यजमान है, कही पर वह महेमान भी है, तो क्या उस व्यक्ति के व्यक्तित्व में कोई फर्क पडता है, कदापि नहीं । भारत में इसे श्रीमान कहेंगे, अमरिका में मिस्टर, अफघान में इन्सान । क्या फर्क पडा संबोधन से ?

परमात्मा के विषय में भी एक विचारणीय बात है । कुछ लोग इश्वरीय अस्तित्व का अस्विकार करते है, तो कुछ इसे मानते भी है । प्रसिद्ध विज्ञानी न्युटन का एक मित्र था, जो ईश्वर को नहीं मानता था । उसका एक ही अभिप्राय था जो दिखता नहीं उसे क्यों स्वीकार करू । न्यूटनने अपनी प्रयोगशाला में एक यन्त्र बनाया, जो पूरे सौरमण्डल के परिभ्रमण की प्रक्रिया बताता था । उसने अपने मित्र को इस यंत्रको देखनेके लिए आमन्त्रित किया । मित्र बहोत खुश हुआ और बोला वाह, क्या बात है अब तो ब्रह्माण्ड की गतिविधिया समझना एकदम सरल हो गया, उसने पूछा – किसने बनाया यह यंत्र ? न्यूटने सहजता से कहा किसीने नहीं । मित्र बोला क्या बात है, ऐस कैसे हो सकता है कोई तो बनाने वाला होगा ही । तब न्यूटनने कहा सही बात है ब्रह्माण्डका दर्शन करानेवाला यंत्र का कोई जनक हो सकता है तो क्या इस ब्रह्माण्डका नही हो सकता ? घटदृष्टा घटात्भिन्नो न कदापि घटो भवेत् । घट को देखते है तो घट को बनानेवाला अवश्य होना चाहिए ।

यदि हम बहारी परमात्मा को नहीं स्वीकार सकते तो, अयंमात्मा ब्रह्म यह परमात्मा सिद्धि का साक्षात् साधन है । यह आत्मा ही परमात्मा का स्वरूप है । अब कहे कि परमात्मा में तो बहोत सर्जन शक्ति है, वह पर्वत, नदीयां, वृक्ष, जीव सबका सर्जन बीना किसी पदार्थ के सहयोग कर सकता है । वह कारण भी है, कार्य भी है, उपादन भी वही है – महाकारण है । यही सर्जन शक्ति हमारे पास भी है । हम भी स्वप्नावस्था में बीना ईंट, सिमेन्ट मकान बनाते है, हमारे जैसे अनेक मानव, प्राणी, नदीया, पर्वत का सर्जन करते है और हमें कोई पदार्थ कि आवश्यकता नहीं हैं । स्वप्नमें मकान के लिए हम सांघी यो ए.सी.सी का सिमेन्ट नही खरीदते । जैसे कोई बडा इन्जीनीयर बडे बडे शहरोंका, कोलोनीयोंका, ब्रीज का सर्जन कर सकता है । इसके पास साधनसमृद्धि ज्यादा होती है । वह बडी यन्त्र शक्तिका स्वामी है, यथा बडा सर्जन कर सकता है, किन्तु एक छोटा कोन्ट्राक्टर मात्र अपने क्षेत्र में ही छोटे-छोटे मकान बनाता है, उसकी शक्ति मर्यादित होती है । इतना ही तफावत आत्मा व परमात्मा में है । परमात्मा समग्र प्रकृतिका स्वामि है – प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय वह कर्तुमकर्तुमन्य़ाकर्तुम् समर्थ है, जब कि हम प्रकृति के अधीन हैं – मर्यादाओं से बंधे है । हमारी सर्जन शक्ति मर्यादित है ।

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा । तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌ ॥ जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात्‌ ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे (जिसको हम अपना इष्ट मानते है) तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान । गीता. १०.४१ ।। ध्रियते अनेनेति धर्मः, धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्, धारणात् धर्ममित्याहुः, धर्मोधारयते प्रजाः जो हर किसीको स्वीकार्य है वही धर्म । पूरा ब्रह्माण्ड का धर्म भी एक है, पिता भी एक है ।

परमात्मा तब ही पूर्ण हो सकता है जब, वह सर्वमें हो, सर्व स्वीकार्य हो – सर्वं खल्विदं ब्रह्म । पूरे ब्रह्माण्ड में जो भी दिखता है वह परमात्मा है द्वैत मत से भी तत्त्वमसि वह तू ही है । काल की प्रत्येक क्षणमें एवं ब्रह्माण्ड की प्रत्येक कणमें परमात्मा का  जो, दिव्य चैतन्य विलसित है वह अद्वय है, पूर्ण है  । उसकी प्रसन्नता, स्वीकृति ही धर्म है ।

एक ऐसी विचारधारा की आवश्यकता है जो विघटित जीव मात्र को संघटित – संगठीत करनेमें समर्थ हो, जो विप्लवमुक्त विश्व की परिकल्पना को सिद्ध कर सके । हर धर्म यही सिखाता हैं कि हम अन्यके प्रति सद्भाव रखे और यही धार्मिकता का श्रेष्ठ लक्षण है । अस्तु ।

One comment

  1. Sunil shukla says:

    Excellent and thought provoking.
    But to understand this and implement in real life, one need to be with educated mind. So education is prime source. Seeds must be sow from childhood by well educated teachers which can yield results in long run. This is my thought
    Best article indeed

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