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मंत्रो की असर – Effect of Mantras

मंत्रो की असर – Effect of Mantras

मंत्रो की असर – Effect of Mantras

मंत्रों की असरकारकता क्यों नहीं होती           – पण्डित परन्तप प्रेमशंकर – सिद्धपुर

 

वैसे तो इस वर्ष में ही मैने एक पुस्तक मंत्रशक्ति एवं उपासना रहस्य प्रकाशित की है, जिसमें मंत्रों की उत्पत्ति, प्रकार, भेद, जाति, उनकी उच्चारण पद्धति, छन्द-विनियोगादि की विस्तृत चर्चा श्रुति-स्मृति, तंत्रागम एवं पुराणो सहित अनेक ग्रंथों के आधार पर की है । यहां मंत्र निष्काम क्यों होते है इसी विषय पर चर्चा करेंगे ।

 

मंत्रो का मूल स्रोत वेद हैवेदो नारायण: साक्षात् । वेद स्वयं नारायण का स्वरूप है जाकी सहज स्वास श्रुति चारी । परमात्मा के निश्वास से उनका प्रागट्य मानते है । वेद की ऋचाओं के प्रमुख तीन भाग है । पहली पुरोनुवाक्या (यज्ञ से पहले पढीजानेवाली), दूसरी याज्या (यज्ञ के समय उच्चरित) और तीसरी शस्या (यज्ञ के बाद की स्तुतियां) है । प्रायः यजन में उपयुक्त मन्त्रों का अर्थ जिस देवता या उपचार के लिए किया गया हो, उसकी संगति नहीं मिलती, तथापि मन्त्रों की शक्तियों को ध्यानमें रखकर ऋषियोंने, उसे कहां प्रयुक्त करना चाहिए, उसका  निर्णय किया है – यज्ञादौ कर्मण्यनेन मन्त्रेणेदं कर्म तत्त्कर्तव्यमित्येवं रूपेण यो मन्त्रान्करोति व्यवस्थापयति स मन्त्रकृत् – यज्ञादि कर्मो मे इस मन्त्र से इस कर्म को करना चाहिए,  ऐसी जो व्यवस्था करता है – विनियोग करता है ।

 

इसी बातकी संगति मुण्डकोपनिषद में भी मिलती हैं – तदेतत्सत्यं मन्त्रेषु करमाणि कवयो यान्यपश्यंस्तानि त्रेतायां बहुधा सन्ततानि । तान्यचरथ नियतं सत्यकामा एषः वः पन्थाः सुकृतस्य लोके ।। क्रान्तदर्शी ऋषियोंने जिन कर्मोका (जिन) मन्त्रोंमें साक्षात्कार किया था, वही सत्य है । यहां त्रेतायां का अर्थ उपरोक्त तीन प्रकारकी ऋचा-मंत्रो को कवयः मन्त्रेषु यानि कर्माणि अपश्यन् अतः मन्त्रोकी सार्थकता जहां उचित लगी वहां प्रयुक्त करनेका आदेश दिया ।

 

अन्यत्र,  सप्तकोटी महामन्त्राः शिववक्त्रात् समुद्भवाः भगवान शिवजी के मुख से ७ करोड मंत्रों का स्फुरण हुआ । वैसे ही तंत्रागमादि में बीजमंत्र, तारकमंत्रादि मंत्रो का प्रागट्य बताया है ।

सर्वेवर्णात्मका मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये। शक्तिस्तु मातृका ज्ञेयो साच ज्ञोया शिवात्मिका ।। कामधेनु तंत्र अमन्त्रम् अक्षरं नास्तिनास्ति मूलमनौषधम् । अयोग्यः पुरुषो नास्ति, योजकस्तत्र दुर्लभः ।।  ऐसा कोई अक्षर नहीं हैं जिसमे मंत्र ना हो, ऐसा कोई पोधा नहीं है जिसमे औषधि ना हो । तथा ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जिसमें कोई भी गुण ना हो ।

 

ककारादि क्षकारान्ता वर्णास्ते शिवरूपिणः । समस्तव्यस्तरूपेण षट्त्रिंशत्तत्त्व विग्रहः ।। अकारादि विसर्गान्ताः स्वराः षोडश शक्तयः । नित्याः षोडशकात्मानः परस्परं समायुताः ।। शिवशक्तिमया वर्णाः शब्दार्थ प्रतिपादकाः। शिवःस्वर पराधीनो न स्वतंत्रःकथंचन । वाक्पदीय में भी कहा है, शब्द-ब्रह्म ।। न सोsस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते। अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वं शब्देन भासते।। (वाक् ब्रह्म ०-१२४). – अर्थात् ऐसा कोई भी ज्ञान नहीं है कि जिसमें शब्द की कारणता न हो। सारे ज्ञान शब्द तत्त्व से ही भासित होते हैं ।  वेद, तंत्र या पुराणों मे जो मंत्र है, वे मात्र गद्य-पद्य ही नहीं है, स्वयं नारायण का स्वरूप है, किसी भी मंत्रमें अर्थरूप में भगवान शिव है एवं परावाक् रूपमें भगवति महाशक्ति है । फिर चाहे वह मंत्र गणेशका है, माताजीका है, वरूणका है या किसी कामना के लिए प्रयुक्त हुआ है । मातृकांपरावागात्मावहृतभट्टारक परमशिवस्वरूपां षट्त्रिंशत्तत्त्व प्रसरणहेतुभूतां संविदामित्यर्थः

 

ऋषयस्तपसा वेदानध्यैषन्त दिवानिशम् । अनादिनिधना विद्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा ।। वेदशब्धेभ्य एवादौ निर्मिमीते स ईश्वरः (म.भा.शां.प २४३.२४-२६) यथा ऋषियों ने तप से ही श्रुति का श्रवण किया है । जिसने उस परमात्मा को आत्मसात् किया है, वैसे मन्त्रदृष्टा ऋषियों की परम्परा को सन्मान करते हुए – उनका प्रयोग करना चाहिए । वेदकी उच्चारण परम्परा एवं वेद शाखानुकल मन्त्रोचाचारण करना ही फलदायी रहता है ।

 

आजकल प्रायः देखा गया है कि कुछ बहुश्रुत वक्ता (पाखण्डी)  व्यासपीठ से अधिकारानधिकार की उपेक्षा करके जनसामान्य को वैदिक-तांत्रिक-बीज मन्त्र रटाते है –  क्रियाकरणहीनत्वात् कथं तेषां हि कर्तृता  । जो मन्त्र आप रटते हो वो किस वेद की कौनसी शाखा का है, उसके ऋषि, छन्द कौनसे है, देवता कौन है, विनियोग क्या है, उसकी उच्चारण प्रणाली क्या है,  मन्त्रानुष्ठान का विनियोग क्या है इत्यादि उक्त वक्ताओं को भी ज्ञान नहीं होता और यह विपरीत असर करता हैं । औषध सेवन से पहले उनके गुण, रोगी की प्रकृत्ति का विचार करना पडता है, अन्यता औषध घातक बन सकती है । जो मंत्र का उपदेश करते है उसका अनुष्ठान स्वयं को करना पडता है । जो मनमें आए वह बोलना तो स्वेच्छाचार है, शास्त्र उसकी अनुमति नहीं देता और शास्त्र अवज्ञा करने वाले चाहे कितने ही अच्छे वक्ता क्यो न हो वे – साक्षरा विपरिता श्च राक्षसा ही केवलम् राक्षस कोटी में आते है ।

 

नानुष्ठानं विना वेद वेदनं पर्यस्यति । ब्रह्मधीस्तवतैवस्यात्फलदेति परामाता ।। जीवहीनो यथादेहः सर्वकर्मसु न क्षमः । पुरश्चरणहीनोपि तथा मन्त्रो न सिद्धिदः।। यः क्रियावान् स पण्डितः । न गच्छति विनापानं व्याधिरौषधशब्दतः । शास्त्र भी कहते हैं कि, वेदों का, शास्त्रों का केवल पठन ही पर्याप्त नहीं हैं, उनका अनुष्ठान भी करना पडता हैं । बिना पुरश्चरण या अनुष्ठान वे फलदायी नहीं होते । जिस प्रकार देह में प्राणकी आवश्यकता हैं वैसे ही अनुष्ठान मन्त्रो की प्राण समान हैं । मात्र औषध की जानकारी ही या निदान ही व्याधि निवृत्ति के लिए पर्याप्त नहीं होता, औषध सेवन करना पडता हैं । यथा खरश्चन्दन भारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य – गर्दभ के पीठ पर रक्खी गई चन्दन की लकडी, उनको भाररूप ही होती है, क्योंकि चन्दन की सुगन्ध से वह अज्ञात हैं, ऐसे ही केवल शास्त्रो का ज्ञान अनेक संकल्प-विकल्प का सृजन करते हैं जब तक साधना की सुगन्ध न मिले ।

 

अपने मन चाही पद्धत्ति से मन्त्र को संगीत के साथ नहीं रटे जाते । मंत्रो की बोलने की अपनी प्रणाली होती है ओर तब ही वे फलप्रद होते है । विसर्गोपसर्ग-अल्पविराम-पूर्णविराम के बीना तो किसी भी भाषा में वाक्यों का अर्थ बदल जाता है, जैसे कि – पकडो, मत गीरने दो और पकडो मत । गीरने दो । में अर्थ विपरित हो जाता है, कं बलवन्तं न बाधयते शीतम् अतः ठंडी किसको नही लगती, जवाब उसी मे है कंबलवन्तं न बाधयते शीतम् अतः कंबल ओढेहुए को ठंड नही लगती । बच्चो को कमरे में बंद रखा गया है और बच्चो को कमरे में बदर खा कया हैGod is nowhere – God is now here दोनों मे अर्थभेद हैं । ऐसे कई उदाहरण हैं ।

 

संस्कृत विश्व की अति समृद्ध भाषा है, वेद विश्व के प्राचीन ग्रंथ होने से उसका प्रयोग व अर्थमें विवेक रखना पडता हैं । वृत्र नाम की एक व्यक्ति था । इन्द्र के साथ उसकी नहीं पडती थी । इस लिए वह वृत्र एक मारण याग करना चाहता था । याग का आरम्भ भी किया । उस याग में प्रयोग करनेवाले एक मन्त्र था कि “इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व​” । इस मन्त्र में “इन्द्रशत्रु” जो शब्द है वह दो प्रकार के होते हैं – आद्युदात एवं अन्तोदात्त के रूप में । यहां पर इन्द्रशत्रु शब्द अन्तोदात्त होने पर उस का अर्थ होगा – इन्द्रस्य शत्रुः (अर्थात् इन्द्र के शमयिता या शातयिता) । आद्युदात्त होने पर अर्थ होता है कि इन्द्रः शत्रुः यस्य सः (इन्द्र जिस का शत्रु है) । यहां पर ऋत्विक के द्वारा “इन्द्र के शमयिता (मारनेवाला)” का अर्थ देनेवाले अन्तोदात्त शब्द “इन्द्रशत्रु” के प्रयोग के स्थान पर “इन्द्र जिस का शत्रु है” अर्थ देनेवाले आद्युदात्त “इन्द्रशत्रु” शब्द का प्रयोग किया गया । जिस गलती से इन्द्र को मारनेवाला अभिचार याग इन्द्र के द्वारा मारनेवाला अभिचार याग बन गया ।

 

यह लेखका आशय अनुकरणशील मनीषावाले जनसामान्य को पाखण्डी वक्ताओं के अनिष्टप्रद अनुकरण से सावधान करना हैं । यदि कोई गुरू ऐसा मन्त्र रटता है तो, उससे दीक्षाक्रम से ही मन्त्र प्राप्त करनेका आग्रह रखें । उस मन्त्रका अधकार, विनियोग, देवता, छन्द, ऋषि, उच्चारण प्रणाली एवं मन्त्र कहा है – मन्त्रकी पूर्वपीठिका जाननेका आग्रह रखे अन्यथा मन्त्र कोई भी रूपमें अनिष्टप्रद (मरणधर्मा) होता हैं । इस विषय पर इसी वर्षमें विद्वज्जनों के करकमलों में मन्त्रशक्ति एवं उपासना रहस्य नामकी एक पुस्तक प्रकाशित की है, जिसमें प.पू.शंकराचार्य एवं कई विद्वानों के अभिप्राय हैं । यह पुस्तक निःशुल्क एवं सर्वजन हितार्थ ही प्रकाशित की है ।

 

आज कल गुरूओं की लंबी कतार लगी है – शिष्यवित्तोपहारकाः, जो शास्त्र की परवा न करते हुए आयेदिन कुछ भी बोलते रहते है, जिनको मात्र प्रतिष्ठा एवं निजि स्वार्थ ही होता है । भगवान् स्वयं कहते  है – न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् । जोषयेत्सर्व कर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन् ।।गी.३.२६ । समर्थ गुरू ब्रह्मतत्त्वकी शास्त्रविरूध्द व्याख्या नहीं करते । तस्माच्छात्रं प्रमाणंते कार्याकार्य व्यवस्थितौ, ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्मकर्तुमिहार्हसि (गी.१७.२४) परमार्थाय शास्त्रीतम् । श्रुति भी कहती हैं कि शास्त्रज्ञोsपि स्वातंत्रेण ब्रह्मज्ञानान्वेषणं न कुर्यात् (मु.उप)। शास्त्रं तु अन्त्य प्रमाणम्। समर्थ होते हुए भी शास्त्रविरूध्द नहीं बोलना ये शास्त्र मर्यादा है । अब आपको ऐसे स्वेच्छाचारी वक्ताओं के अनुकरण करके, पतन के मार्गमें जाना हैं या परमात्मा की शरण में, यह आप पर निर्भर है ।  इस लेखका उद्देश्य शास्त्रसेवा एवं जनसामान्य को उचितमार्ग प्रशस्त करना ही है – अस्तु ।  

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