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वैदिक संस्कृत

वैदिक संस्कृत


: वैदिक-परिभाषाएँ :–

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इस लेख में हम वैदिक वाङ्मय के कुछ कठिन और अप्रचलित शब्दों की जानकारी देंगे । आशा है आपके ज्ञान में वृद्धि होगी ।


(१.) मन्त्रः—आचार्य यास्क के अनुसार “मन्त्राः मननात्” अर्थात् जिसका मनन किया जाए, उसे “मन्त्र” कहते है ।


एक अन्य स्थल पर कहा गया है, “कर्मसम्पत्तिर्मन्त्रो वेदे” अर्थात् यज्ञ कर्म का सम्पादन करने के लिए ऋषि-दृष्ट वाक्य को “मन्त्र” कहते हैं ।


मन्त्र शब्द में चुरादिगणीय “मत्रि गुप्तपरिभाषणे” धातु है । इसलिए मन्त्र शब्द का लौकिक प्रयोग भी होता है । जब राजा अपने विशेष मन्त्रियों के साथ किसी गुप्त विषय पर परामर्श करता है , तब उसे भी मन्त्र कहते है । इसीलिए मन्त्रियों के विभाग को “मन्त्रालय” और विशेष विभाग आवंटित सांसद को “मन्त्री” कहते हैं ।


(२.) संहिता—मन्त्रों के संकलन का नाम “संहिता” है , जो चार नामों से अभिहित होता है—ऋक्, यजुः, साम और अथर्व । इन्हें वेद, श्रुति भी कहा जाता है ।


व्याकरण में “संहिता” का अभिप्राय है—“परः सन्निकर्ष संहिता” (अष्टाध्यायी–१.४.१०८) अर्थात्—अत्यन्त समीपता को “संहिता” कहते हैं । जैसे मधु+अत्र= मध्वत्र ।


(३.) आरण्यक—–आरण्यक का शाब्दिक अर्थ है—अरण्य में होने वाला “अरण्ये भवम्” आरण्यकम् । अरण्य वन को कहते हैं । अरण्य में होने वाले अध्ययन-अध्यापन, मनन, चिन्तन, शास्त्रीय-चर्चा और अध्यात्म-विवेचन को सामान्य रूप से “आरण्यक” कहा गया । इस विषयों के संकलनात्मक ग्रन्थों को आरण्यक कहा जाता है । इन्हें रहस्य भी कहा गया है । इसके अन्तर्गत आत्मविद्या, तत्त्वचिन्तन और रहस्यात्मक विषयों का वर्णन है । इनमें यज्ञों का गूढ विषय और ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन है । वस्तुतः हमारी वैदिक संस्कृति वन व प्रकृति पर आधारित है । इसका अभिप्राय यही है कि प्रकृति से हम दूर न चले जाएँ । वैदिक ग्रन्थों को समझने के लिए इनकी अत्यन्त आवश्यकता होती है ।


(४.) ब्राह्मणः—वैदिक वाङ्मय का एक अन्य भाग “ब्राह्मण” है । इसका लक्षण है—“शेषे ब्राह्मण-शब्दः” अर्थात् मन्त्रों के अतिरिक्त यागों के विधि-विधान मन्त्रों का विनियोग तथा मन्त्र सम्बन्धी विवेचन आदि ब्राह्मण-ग्रन्थों में किया गया है ।


ब्रह्मन् शब्द के तीन अर्थ हैं—(१.) ब्रह्मन् शब्द का अर्थ “मन्त्र” है । ब्राह्मण-ग्रन्थों में वेदमन्त्रों की व्याख्या और विनियोग है । (२.) ब्रह्मन् का अर्थ “यज्ञ” है । ब्राह्मण-ग्रन्थों में यज्ञों की व्याख्या और विवरण दिए हुए हैं । (३.) ब्रह्मन् शब्द का अर्थ है पवित्र ज्ञान या रहस्यात्मक विद्या । अतः जिन ग्रन्थों में वैदिक रहस्यों का उद्घाटन किया गया है, उन्हें “ब्राह्मण” कहते हैं ।


इन ग्रन्थों में यज्ञों का आध्यात्मिक,, आधिदैविक और वैज्ञानिक स्वरूप प्रस्तुत किया गया है ।


मीमांसा दर्शन का कथन है कि मन्त्रभाग या संहिताग्रन्थों के अतिरिक्त वेदभाग को “ब्राह्मण” कहते हैं ।


भट्ट भास्कर का कहना है कि कर्मकाण्ड और मन्त्रों के व्याख्यान ग्रन्थों को “ब्राह्मण” कहते हैं ।


वाचस्पति मिश्र का कहना है कि जिन ग्रन्थों में निर्वचन (निरुक्ति) , मन्त्रों का विविध यज्ञों में विनियोग, प्रयोजन. प्रतिष्ठान (अर्थवाद) और विधि का वर्णन होता है, उन्हें “ब्राह्मण” कहते हैं ।


यह ग्रन्थ वाचक ब्राह्मण शब्द नपुंसक लिग में होता है, किन्तु वर्ण (कुल, वंश) वाचक ब्राह्मण शब्द पुल्लिंग में होता है ।


(५.) ऋषिः—“ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः” अर्थात् मन्त्रों के दर्शन (अनुभूति) करने वाले व्यक्तियों को “ऋषि” कहते हैं । इसलिए जिन-जिन मन्त्रों के दर्शन जिन-जिन ऋषियों ने किए हैं, उन-उन मन्त्रों के वे ऋषि कहते जाते हैं । इनमें वशिष्ठ, गौतम, विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, अङ्गिरा, गृत्समद आदि हैं ।


(६.) छन्दः—अधिकांश मन्त्र छन्दोबद्ध है । इसीलिए वेद का एक अन्य नाम “छन्दस्” भी है । कात्यायन के अनुसार “यदक्षरपरिमाणं तच्छन्दः” अर्थात् अक्षरों के नियत परिमाण को “छन्द” कहते हैं । छन्द का बन्धन ऋग्वेद में पूर्ण रूप से उपलब्ध है । उन छन्दों में गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, बृहती, उष्णिक्, पङ्कि, आदि प्रसिद्ध है । गायत्री-छन्द सर्वाधिक प्रसिद्ध है । गायत्री —२४, उष्णिक्—२८, अनुष्टुप्—३२, बृहती—३६, पङ्कि्त–४०, त्रिष्टुप्—४४ और जगती में ४८ अक्षर होते हैं ।


छन्दों के कारण आजतक वेदमन्त्रों में एक वर्ण की भी मिलावट नहीं हो सकी है । मिलावट को “प्रक्षेप” बोला जाता है ।


इस प्रकार मन्त्र-गणना, पद-गणना तथा अक्षर-गणना के कारण वेद अपने मूल रूप उपलब्ध है ।


(७.) देवता—-वेदमन्त्रों में देवता शब्द उस मन्त्र के विषय होते हैं । अर्थात् मन्त्रों के सम्बन्ध में देवता “विषय” को कहा जाता है । इस प्रकार जिस मन्त्र के जो देवता है, समझना चाहिए कि उस मन्त्र का विषय वही है । मुख्य देवता तीन ही है—पृथिवी स्थानीय अग्नि है, अन्तरिक्ष स्थानीय इन्द्र (वायु) है और द्युलोक स्थानीय आदित्य (सूर्य) है । कुल देवता ३३ ही हैं—८ वसु, ११ रुद्र, १२ आदित्य, द्यौ और पृथिवी या (इन्द्र और प्रजापति) ।


निरुक्त के अनुसार देव शब्द—“देवो दानाद् वा, दीपनाद् वा, द्योतनाद् वा, द्युस्थानो भवतीति वा ।” संस्कृत में देव और देवता शब्द एक ही अर्थ के वाचक है । देव पुल्लिंग और देवता स्त्रीलिंग में है ।


(८.) ऊपर चौथे भाग में “विनियोग” शब्द आया है । उसका अभिप्राय है कि किस मन्त्र का क्या विशेष उपयोग है और किस कर्म में है । इसे ही विनियोग कहते हैं । ये विनियोग ऋषियों द्वारा ही निश्चित है । किन्तु आजकल सामान्य जन भी इसका विनियोग करने लग गए हैं , जो अनर्थक है ।

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