Search News Posts

  • General Inquiries :- +91-9799213697

  • Support :- +91-9509559668

Home

साहित्यशास्त्र का विकास क्रम

साहित्यशास्त्र का विकास क्रम

साहित्यशास्त्र का विकास क्रम
डा.राकेश कुमार जैन
साहित्यशास्त्र के बीज हमें वैदिक युग से ही प्राप्त हो रहे हैं किन्तु भरत मुनि के नाट्यशास्त्र से पूर्व ऐसा कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है जिसको हम विशुद्ध साहित्यशास्त्रीय ग्रन्थ कह सकें । अतः काव्य के शास्त्रीय स्वरूप का निरूपण करने वाला प्राचीनतम ग्रन्थ भरत मुनि कृत ‘नाट्यशास्त्र’ को ही मानना चाहिए । जिसका समय विक्रम पूर्व दूसरी शताब्दी विद्वानों द्वारा स्वीकार किया गया है । नाट्यशास्त्र के पश्चात् इस विषय से सम्बन्धी जिस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की उपलब्धि हुई है वह है – विक्रम की छटवीं शताब्दी में प्रणीत आचार्य भामह का ‘काव्यालङ्कार’ । इस प्रकार विक्रम से पूर्व द्वितीय शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक साहित्यशास्त्रीय सिद्धान्तों का प्रतिपादन करनें वाले मौलिक ग्रन्थों की रचना निरन्तर प्रायः होती रही है । साहित्यशास्त्र के इस क्रमिक विकास को हम चार विभागों में देख सकते हैं – 1. प्रारम्भिक काल (वैदिक युग से लेकर भामह के पूर्व तक) 2. रचनात्मक काल (भामह से लेकर आनन्दवर्धन से पूर्व तक) 3. निर्णयात्मक काल (आनन्दवर्धन से लेकर मम्मट तक) 4. व्याख्यात्मक काल (मम्मट के बाद से लेकर विश्वेश्वर पाण्डेय तक ) । संक्षेप में इन विभागों के अनुसार विकास क्रम को देखते हैं –
प्रारम्भिक काल – वैदिक साहित्य में तथा इसके बाद निरुक्त , व्याकरण , उपनिषद् , रामायण , महाभारत आदि साहित्य में ऐसी रचनायें हैं , जो काव्य रूप हैं । इनके अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि उस युग में साहित्यशास्त्र की किसी न किसी रूप में रचना अवश्य हुई होगी, किन्तु वर्तमान में तत्कालीन ऐसा कोई भी ग्रन्थ अपलब्ध नहीं होता है । साहित्यशास्त्र विषयक जो प्राचीनतम ग्रन्थ उपलब्ध है , वह भरतमुनि का ‘नाट्यशास्त्र’ ही है । इसमें रस और नाट्यतत्त्वों का सूक्ष्मता से विवेचन के साथ सोलहवें अध्याय में 4 अलंकारों , 10 गुणों और 10 दोषों का भी निरूपण किया है । भरतमुनि के बाद मेधावी, रुद्र आदि आलङ्कारिक आचार्यों के नाम अन्य ग्रन्थों के उद्धरण से प्राप्त होते हैं , किन्तु इनका भी कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है । अग्निपुराण भी इस युग का ग्रन्थ है । इसमें अनेक वैज्ञानिक विषयों का विवेचन है साथ ही इसके ग्यारह अध्यायों (336 से 346 ) में साहित्यशास्त्र से सम्बन्धित तत्त्वों का विवेचन है ।
रचनात्मक काल – आचार्य भामह से लेकर आनन्दवर्धनाचार्य से पूर्व तक के काल को रचनात्मक काल कहते हैं । इस युग में मुख्यतः तीन सम्प्रदायों का विकास हुआ था । जिनके नाम व प्रतिपादक प्रमुख आचार्यों के नाम निम्न प्रकार से हैं – (क) अलङ्कार सम्प्रदाय (भामह, दण्डी, उद्भट, रुद्रट) , (ख) रीति सम्प्रदाय (आचार्य वामन) , (ग) रस सम्प्रदाय (भरत के रस सूत्र के व्याख्याकार) । साहित्यशास्त्र के विकास की दृष्टि से यह युग बहुत महत्त्व का है । इस युग में मुख्य रूप से काव्य में प्रधानता अलङ्कारों की प्रतिपादित की है । भामह, दण्डी, उद्भट और रुद्रट ने अपने शास्त्रीय ग्रन्थों में अलंकारों का विशद विवेचन किया है । दण्डी ने अलंकारों के साथ रीति का भी निरूपण किया है । वामन ने मुख्यतः गुणों को काव्य की शोभा का उत्पादक तत्त्व प्रतिपादित करके रीति को काव्य की आत्मा सिद्ध किया था । इसी युग में भट्टलोल्लट,शंकुक,भट्टनायक आदि ने भरत के रस सूत्र की विशद व्याख्या की थी ।
निर्णयात्मक काल – साहित्यशास्त्र के विकास की दृष्टि से यह युग सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है । इस काल में आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक में ध्वनि के स्वरूप का प्रतिपादन करके ध्वनि को काव्य की आत्मा प्रतिपादित किया । उन्होंने निर्णय किया कि काव्य में ध्वनि ही सबसे प्रमुख और आह्लादक तत्त्व है । रस, गुण, अलंकार, रीति, आदि सब उसके गुणों को उत्कर्ष करते हैं । ध्वन्यालोक के टीकाकार अभिनव गुप्त ने ध्वनिकार के मत का समर्थन किया । इसके बाद मम्मटाचार्य ने काव्यप्रकाश की रचना कर ध्वनिविरोधियों की युक्तियों का प्रबल शब्दों में खण्डन किया और ध्वनि की निर्णयात्मक रूप में स्थापना की, जिसको प्रायः सभी ने काव्य की आत्मा के रूप में अन्तिम रूप से स्वीकार कर लिया । आनन्दवर्धन के बाद कुन्तक ने वक्रोक्तिजीवित ग्रन्थ की रचना करके वक्रोक्ति सम्प्रदाय का प्रचलन किया, किन्तु इसका प्रचलन अधिक नहीं हुआ । इस प्रकार इस युग में दो सम्प्रदायों का विकास हुआ – ध्वनि सम्प्रदाय और वक्रोक्ति सम्प्रदाय । इस युग के प्रमुख आचार्य हुए – आनन्दवर्धन , अभिनवगुप्त , कुन्तक , महिमभट्ट , रुद्रट , भोजराज, धनिक , धनञ्जय और मम्मट ।
व्याख्यात्मक काल – साहित्यशास्त्र के विकास का चतुर्थ काल व्याख्यात्मक काल कहा जाता है । इसका समय मम्मट के बाद से लेकर ईसा की अठारहवीं शताब्दी में पण्डितराज जगन्नाथ एवं विश्वेश्वर पाण्डेय तक विस्तृत है । इस युग में अनेक प्रसिद्ध आचार्य हुए , जिन्होंने काव्य के सभी तत्त्वों की विवेचना करते हुए सर्वाङ्गपूर्ण मौलिक ग्रन्थ लिखे थे । इन आचार्यों में प्रमुख हेमचन्द्र , विश्वनाथ , जयदेव, जगन्नाथ, विश्वेश्वर आदि थे । रुय्यक एवं अप्पयदीक्षित आदि ने केवल अलंकारों का ही विवेचन किया । शारदातनय , शिङ्गभूपाल तथा भानुदत्त आदि का सिद्धान्त के विवेचन में सराहनीय प्रयास रहा । राजशेखर , अमरचन्द्र आदि ने कविशिक्षा के विषय पर अपनी लेखनी चलायी । इस युग में आचार्य क्षेमेन्द्र ने वस्तुतः सम्पूर्णरूप से मौलिक चिन्तन करके औचित्यविचारचर्चा ग्रन्थ लिखा तथा औचित्य सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया ।
साहित्यशास्त्र के विकास के क्रम में ‘ध्वनि की उद्भावना तथा इसका काव्य की आत्मा के रूप में प्रतिपादन’ एक प्रमुख घटना है । आनन्दवर्धन ने ध्वनि को काव्य की आत्मा प्रतिपादित करके साहित्यशास्त्र के विकास को एक नवीन पथ प्रवर्तित किया । इस ध्वनि सिद्धान्त की दृष्टि से साहित्यशास्त्र के विकास क्रम को तीन युगों में भी विभक्त कर सकते हैं – (क) ध्वनि से पूर्व का युग जो कि वैदिक युग से ई. की आठवीं शताब्दी तक है (ख) ध्वनि युग जो कि आठवीं से दसवीं शताब्दी है ।(ग) ध्वनि की व्याख्या युग जो कि दसवीं शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी तक है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!