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वैदिक संस्कृति का चीरहरण

वैदिक संस्कृति का चीरहरण              पंण्डित परन्तप प्रेमशंकर (सिद्धपुर) भीष्मपितामह, महाभारत का एक उदार चरित पात्र हैं, तथापि द्रौपदी के चीरहरण पर मौन रहने के कारण, उनकी श्वेत एवं निर्मल प्रतिभा पर एक कलंक भारतीय इतिहास में आज भी अंकीत हैं । आज कई बहुश्रुत वक्ता हमारी सभ्यता एवं सांस्कृति को विकृत एवं कलंकित करने […]

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वैदिक संस्कृति का चीरहरण              पंण्डित परन्तप प्रेमशंकर (सिद्धपुर) भीष्मपितामह, महाभारत का एक उदार चरित पात्र हैं, तथापि द्रौपदी के चीरहरण पर मौन रहने के कारण, उनकी श्वेत एवं निर्मल प्रतिभा पर एक कलंक भारतीय इतिहास में आज भी अंकीत हैं । आज कई बहुश्रुत वक्ता हमारी सभ्यता एवं सांस्कृति को विकृत एवं कलंकित करने […]

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मंत्रो की असर – Effect of Mantras

मंत्रों की असरकारकता क्यों नहीं होती           – पण्डित परन्तप प्रेमशंकर – सिद्धपुर   वैसे तो इस वर्ष में ही मैने एक पुस्तक मंत्रशक्ति एवं उपासना रहस्य प्रकाशित की है, जिसमें मंत्रों की उत्पत्ति, प्रकार, भेद, जाति, उनकी उच्चारण पद्धति, छन्द-विनियोगादि की विस्तृत चर्चा श्रुति-स्मृति, तंत्रागम एवं पुराणो सहित अनेक ग्रंथों के आधार पर की […]

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मंत्रों की असरकारकता क्यों नहीं होती           – पण्डित परन्तप प्रेमशंकर – सिद्धपुर   वैसे तो इस वर्ष में ही मैने एक पुस्तक मंत्रशक्ति एवं उपासना रहस्य प्रकाशित की है, जिसमें मंत्रों की उत्पत्ति, प्रकार, भेद, जाति, उनकी उच्चारण पद्धति, छन्द-विनियोगादि की विस्तृत चर्चा श्रुति-स्मृति, तंत्रागम एवं पुराणो सहित अनेक ग्रंथों के आधार पर की […]

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धर्म एवं ईश्वर का स्वरूप

धर्म एवं ईश्वर का वास्तविक स्वरूप     –    पण्डित परन्तप प्रेमशंकर सिद्धपुर   विश्वमें अनेक संस्कृतियां एवं सभ्यताए प्रवर्तमान है । मानवी अपनी संस्कृति या सभ्यता को ही सर्वश्रेष्ठ स्थापित करनेका प्रयास करता रहता है, और वह सर्वस्विकार्य नहीं होता । परिणामतः वर्गविग्रह, जातिविग्रह, देशविग्रहादि का प्रकोप बढता है ।   हमारी मान्यताए एवं विचारधारा […]

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धर्म एवं ईश्वर का वास्तविक स्वरूप     –    पण्डित परन्तप प्रेमशंकर सिद्धपुर   विश्वमें अनेक संस्कृतियां एवं सभ्यताए प्रवर्तमान है । मानवी अपनी संस्कृति या सभ्यता को ही सर्वश्रेष्ठ स्थापित करनेका प्रयास करता रहता है, और वह सर्वस्विकार्य नहीं होता । परिणामतः वर्गविग्रह, जातिविग्रह, देशविग्रहादि का प्रकोप बढता है ।   हमारी मान्यताए एवं विचारधारा […]

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न्यायसूत्र 

​न्यायसूत्र भारतीय दर्शन का प्राचीन ग्रन्थ है। इसके रचयिताअक्षपाद गौतम हैं। यह न्यायदर्शन का सबसे प्राचीन रचना है। न्यायसूत्र के रचनाकाल के विषय में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है। महामहोपाध्याय हर प्रसाद शास्त्री इसका काल खृष्टीय द्वितीय शतक मानते हैं। सूत्रों में शून्यवाद का खण्डन पाकर डा. याकोबी महाशय न्यायसूत्रों का रचनाकाल खृष्टीय तृतीय शताब्दी मानते हैं। महामहोपाध्याय सतीशचन्द्र विद्याभूषण ने अपने […]

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​न्यायसूत्र भारतीय दर्शन का प्राचीन ग्रन्थ है। इसके रचयिताअक्षपाद गौतम हैं। यह न्यायदर्शन का सबसे प्राचीन रचना है। न्यायसूत्र के रचनाकाल के विषय में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद है। महामहोपाध्याय हर प्रसाद शास्त्री इसका काल खृष्टीय द्वितीय शतक मानते हैं। सूत्रों में शून्यवाद का खण्डन पाकर डा. याकोबी महाशय न्यायसूत्रों का रचनाकाल खृष्टीय तृतीय शताब्दी मानते हैं। महामहोपाध्याय सतीशचन्द्र विद्याभूषण ने अपने […]

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